IAS Motivational Story : बचपन में हो गया था पोलियो, मां के साथ सड़क पर चूड़ियां बेचने पड़े

IAS Motivational Story : हेलो दोस्तों आज हम एक ऐसे शख्स के Success Story की बात करने जा रहे हैं जिन्होंने संघर्ष कर अपने मेहनत और लगन के दम पर आईएएस ऑफिसर का पद हासिल किया है.

शराब की वजह से पिता की मृत्यु के बाद मां के साथ सड़क किनारे चूड़ियां बेचनी पड़ी और तो और बचपन में ही उन्हें पोलियो हो गया था. जिस कारण उनका बचपन विकलांगता एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ तले दब गया, फिर भी आईएएस बनने का सपना नहीं छोड़ा. 

वह शख्स कोई और नहीं Ramesh Gholap IAS Officer है. तो आइए जानते हैं इनके संघर्ष भरे जीवन के IAS officer बनने तक की पूरी कहानी, ताकि उन लाखों युवाओं को प्रेरणा मिल सके.

IAS Officer Ramesh Gholap की Success Story :- 

आज हम आपके सामने एक ऐसा Story Share करने जा रहे हैं जो उन लाखों युवाओं को प्रेरणा देगी. ऐसे बहुत से युवा हैं जो आईएएस ऑफिसर बन कर हमारे देश और समाज की सेवा करने का सपना देख रहे हैं. 

IAS Officer बनना हर किसी के बस की बात नहीं है. हर साल लाखों युवा आईएएस ऑफिसर बनने का सपना देखते हैं और तैयारी भी करते हैं मगर कुछ खास उम्मीदवार ही अपनी लगन और कड़ी मेहनत से आईएस ऑफिसर बन पाते हैं.

उन्हीं खास में से एक IAS Officer Ramesh Gholap जी है. ये एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने बिना किसी कोचिंग के बिना किसी सहायता के अपनी लगन और कड़ी मेहनत से अपने दम पर आईएएस ऑफिसर का पद हासिल किया है. दोस्तों वो कहते हैं ना अगर इंसान की नियत अच्छी और मेहनत सच्ची हो तो एक दिन कामयाबी जरूर मिल जाती है.

आज का लेख है उस IAS officer Ramesh Gholap कि है जिन्हें बचपन में ही पोलिया हो गया था. साधारण स्कूल से दसवीं पास करने के बाद कक्षा 12वीं में वे 88.5% अंको से पास हुए थे. पिता की मृत्यु के बाद उन्हें मां के साथ सड़कों पर चूड़ियां बेचनी पड़ी थी. 

इतना ही नहीं 12वी पूरी कर डिप्लोमा की डिग्री प्राप्त करने के बाद अपने गांव में ही शिक्षक का कार्य करने लगे साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखें. यूपीएससी की तैयारी करने लगे. पहला यूपीएससी का परीक्षा फेल हो जाने के कारण वे दोबारा फिर से प्रयास किए और दूसरी बार यूपीएससी का परीक्षा निकाल लिए और आईएएस ऑफिसर का पद अपने नाम कर लिए. 

IAS Officer Ramesh Gholap के पिता की मृत्यु हुई सरकारी अस्पताल में :-

यह बात उन दिनों की है जब रमेश घोलाप का पूरा परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. रमेश के पिता को शराब पीने की आदत थी जिस वजह से दिन-प्रतिदिन उनका तबीयत खराब होता चला गया जब उनकी तबीयत पूरी बिगड़ गई थी तब उन्हें सरकारी अस्पताल में दाखिला कराया गया.

उनके परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि उनका इलाज कोई अच्छी प्राइवेट हॉस्पिटल में कराई जाती. पैसे की कमी के कारण उनके पिता का इलाज ना हो पाना, जिस कारण उनके पिता की मृत्यु हो गई. जब उनके पिता की मृत्यु हुई उस समय Ramesh Gholap उस गांव में, उस अस्पताल में मौजूद नहीं थे. 

रमेश के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि अपने पिता के अंतिम संस्कार में जा सके :-

Ramesh Gholap अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए वे अपने चाचा के गांव  बरसी चले गए थे. जिस वक्त उनके पिता की मृत्यु हुई थी वह उस वक्त अपने गांव में मौजूद नहीं थे. जैसे ही हमको यह खबर मिला कि उनके पापा की मृत्यु हो गई है तो वह जल्द से जल्द अपने गांव अपने पिताजी के पास जाना चाहते थे.

चाचा के गांव से उनके गांव जाने में बस का किराया ₹7 था. जबकि विकलांग लोगों के लिए ₹2 किराया  हुआ करता था. मगर ऐसी आर्थिक स्थिति थी रमेश की कि उनके पास वह ₹2 भी नहीं थे. बहुत मुश्किल से वे अपने चाचा जी से उधार लेकर अपने गांव गए.

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मां के साथ सड़क पर चूड़ियां बेचने पड़े :- 

यह बात उस टाइम की है जब 2005 मे Ramesh Gholap के पिताजी की मृत्यु हो गई थी. घर में अन्न का एक दाना तक नहीं था पेट भरने के लिए तो ऐसे में उनकी मां सड़क किनारे फुट पर चूड़ियां बेचने लगी.

इकलौता सहारा होने के कारण उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होने लगा अपनी मां को अकेला काम करता है देख उनका मन नहीं माना, तो वे में मां के साथ चूड़ियां बेचने लगे. मगर अपनी पढ़ाई नहीं छोड़े.

घर की आर्थिक तंगी को दूर करने के लिए शिक्षक बनना पड़ा :-

चूड़ियां बेचकर इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि अपनी पढ़ाई भी पूरी कर सके और घर का खर्चा भी चल सके. ऐसे में उन्हें एक आइडिया आया कि उन्हें शिक्षक बन जाना चाहिए. कक्षा 12वीं में 88.5% अंक प्राप्त करने के बाद Ramesh Gholap डिप्लोमा की पढ़ाई करने गांव से बाहर गए और अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद भी अपने गांव के स्कूल में ही एवं घर में बच्चों को पढ़ाने लगे. पढ़ाने के साथ-साथ उन्होंने B.A. कंप्लीट किया. 

अच्छी खासी कमाई हो रही थी सब कुछ हासिल हो रहा था धीरे-धीरे मगर इसके बाद भी रमेश के मन में संतुष्टि नहीं थी उन्हें तो कुछ और ही करना था. उन्होंने आईएएस ऑफिसर बनने का सपना देख रखा था जिसे पूरा भी करना था.

अपने सपने पूरे करने के लिए गांव वालों से पैसे उधार लेने पड़े :-

6 महीने तक शिक्षक का कार्य करने के बाद वे अपना नौकरी छोड़ दिए. अपना सपना पूरा करने में जुट गए वे दिन-रात कड़ी मेहनत से अपनी पढ़ाई करते. वर्ष 2010 में उन्होंने पहला UPSC exam दिया  मगर वे फेल हो गए, सफलता हाथ ना लगने के बाद वे फिर से कोशिश करने की ठाणे.

इस बार उन्होंने यूपीएससी को क्लियर करने के लिए बाहर जाना सही समझा. जिसके लिए उसकी मां को अपने गांव वालों से पैसे उधार लेने पड़े ताकि अपने बेटे को पढ़ा सकें. रमेश को यूपीएससी की पढ़ाई के लिए गांव से बाहर भेजा.

जब वे अपने गांव से जा रहे थे मन में दृढ़ निश्चय से एक कसम खाया कि अब IAS Officer बनूंगा तभी अपने गांव वापस आऊंगा. इसके बाद रमेश ने अपनी पढ़ाई मन लगा कर पूरी की और वर्ष 2012 में यूपीएससी परीक्षा में 287 वी रैंक हासिल किया. 

IAS Officer बनने के लिए क्या-क्या वे किए :-

आईएएस ऑफिसर बनने के लिए सबसे पहले उन्होंने अपने सिलेबस को कंप्लीट करना समझा. सिलेबस पूरी करने के साथ-साथ में रिवीजन भी करते चले गए रिवीजन करने के लिए उन्होंने अलग से टाइम नहीं दिया बल्कि वह बच्चों को टेंथ क्लास, नाइंथ क्लास, 12वीं क्लास सभी को भी पढ़ाने लगे इससे भी उनका रिवीजन होते चला गया और इनकम भी होती चली गई.

अपनी पढ़ाई यूपीएससी की तैयारी में गांव से बाहर जाकर किए थे जो कि सिर्फ और सिर्फ उनका ध्यान से पढ़ने पर ही था. आप भी अपनी लगन और मेहनत से कोई भी कार्य करेंगे तो निश्चय है कि आपको सफलता जरूर मिलेगी.

निष्कर्ष :-

दोस्तों इस आर्टिकल से येही निष्कर्ष निकलता है कि जीवन में कितने भी कठिनाइयां आए जितना भी संघर्ष करना पडे मगर अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ना चाहिए. अगर आप अपने जीवन में सफलता पाना चाहते हैं तो अपने लक्ष्य को भटकने ना दे हर संभव प्रयास करें उसे पूरा करने के लिए. हर इंसान को नई शुरुआत डराती है लेकिन कामयाबी मुश्किलों के बाद ही  आती है.

 उम्मीद करते हैं दोस्तों हमारा आज का आर्टिकल आपको बेहद पसंद आया और आपको इस सक्सेस स्टोरी से कुछ सीखने को मिला होगा तो लाइक जरूर करें.

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Ahmed Ruhul Amin

हिंदी भाषा के माध्यम से सरकारी योजना, परीक्षा, नौकरी, तकनीक और ट्रेंडिंग जानकारी लिखना मुझे बहुत पसंद है.

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